मस्तिष्क में बन गया था खून का थक्का:-
सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ जितिन बजाज ने बताया कि रॉड बच्ची की खोपड़ी की हड्डी को भेदते हुए मस्तिष्क में प्रवेश कर गई थी। इस कारण मस्तिष्क में खून का थक्का जम गया था। स्थिति बेहद संवेदनशील थी। समय पर उपचार नहीं मिलने पर बच्ची की आंखों की रोशनी जाने, संक्रमण फैलने और यहां तक कि जान जाने का खतरा भी था। चिकित्सकों की टीम ने सूझबूझ और विशेषज्ञता के साथ ऑपरेशन कर रॉड को बाहर निकाला।
बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावक रहें सतर्क:-
यह घटना हर अभिभावक के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। छोटे बच्चे खेलते समय खतरे और सुरक्षा के बीच अंतर नहीं समझ पाते। ऐसे में घर, आंगन और आसपास के खेलस्थल पर रखी नुकीली वस्तुएं, लोहे की रॉड, सरिया, कील, धारदार औजार और खुले तार बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
अभिभावक इन बातों का रखें विशेष ध्यान:-
:- बच्चों को कभी भी खुले निर्माण स्थलों, लोहे के सरियों और नुकीली वस्तुओं के आसपास अकेला न छोड़ें।
:- घर में रखे औजार, चाकू, कैंची, कील और अन्य धारदार सामान बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
:-खेलते समय छोटे बच्चों पर लगातार निगरानी रखें।
:-सिर में चोट लगने, नुकीली वस्तु घुसने या असामान्य व्यवहार दिखाई देने पर तत्काल अस्पताल पहुंचें।
:-सिर में घुसी किसी वस्तु को स्वयं खींचकर निकालने का प्रयास बिल्कुल न करें। इससे रक्तस्राव और मस्तिष्क की चोट गंभीर हो सकती है। ऐसी स्थिति में वस्तु को स्थिर रखते हुए तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।
चिकित्सकीय टीम का रहा महत्वपूर्ण योगदान:-
इस जटिल उपचार एवं ऑपरेशन में मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ नवनीत सक्सेना, सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की संचालक डॉ अपर्णा तामस्कर, अधीक्षक लेफ्टिनेंट कर्नल डॉ जितेंद्र गुप्ता, न्यूरो सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. विजय परिहार, डॉ शैलेंद्र रात्रे, डॉ मुकेश शर्मा, डॉ आशुतोष कारपेंटर तथा एनेस्थीसिया विभाग की टीम से डॉ अपर्णा तामस्कर एवं डॉ वरुण अरोड़ा का महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

